नई दिल्ली: ऑल इंडिया रेडियो की 6 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक़, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने कहा है कि भारत की राष्ट्रीय टेलीमेडिसिन सेवा ई-संजीवनी ने 50 करोड़ टेली-परामर्श पार कर लिए हैं। मंत्रालय ने कहा कि "यह उपलब्धि देश की मौजूदा स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की पूरक के रूप में टेलीमेडिसिन की बढ़ती भूमिका को दिखाती है।"
यह आंकड़ा सेवा की शुरुआत से अब तक सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का कुल है। मंत्रालय ई-संजीवनी को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा में दुनिया का सबसे बड़ा टेलीमेडिसिन कार्यान्वयन बताता है।
डिजिटल हेल्थ न्यूज़ के मुताबिक़, ई-संजीवनी नवंबर 2019 में डॉक्टर-से-डॉक्टर सेवा के रूप में शुरू हुई, जिसमें स्थानीय केंद्र का स्वास्थ्य कर्मी मरीज़ को किसी हब पर बैठे डॉक्टर से जोड़ता है, और अप्रैल 2020 में, कोविड-19 महामारी के दौरान, इसमें मरीज़ और डॉक्टर के बीच सीधे परामर्श जोड़े गए। स्वास्थ्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने संसद को बताया था कि सभी 28 राज्यों और आठ केंद्रशासित प्रदेशों में चलने वाली यह सेवा 23 नवंबर 2025 तक 43 करोड़ परामर्श पार कर चुकी थी, यानी तब से करीब 7 करोड़ और जुड़े हैं। जिन नागरिकों के पास फ़ोन या कंप्यूटर नहीं है, वे पास के स्वास्थ्य केंद्र से इस सेवा का इस्तेमाल कर सकते हैं।
यह प्लेटफ़ॉर्म आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन से जुड़ा है। जाधव ने कहा, "ई-संजीवनी आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के प्रमुख आधारों, जैसे हेल्थकेयर प्रोफ़ेशनल्स रजिस्ट्री, हेल्थ फ़ैसिलिटी रजिस्ट्री, आभा एकीकरण और आपस में जुड़ सकने वाले इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड के अनुरूप है।"
ई-संजीवनी स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों के मरीज़ों को हब पर बैठे डॉक्टरों से जोड़ती है। यह फ़िलहाल 1.42 लाख से ज़्यादा आयुष्मान आरोग्य मंदिर केंद्रों और 19,000 से ज़्यादा मेडिकल हब के साथ-साथ 901 ऑनलाइन ओपीडी को सहायता देती है। प्लेटफ़ॉर्म पर दो लाख से ज़्यादा स्वास्थ्य सेवा प्रदाता पंजीकृत हैं।
यह सेवा अंग्रेज़ी और 14 भारतीय भाषाओं समेत 15 भाषाओं में हर दिन करीब 2.5 लाख से 3 लाख परामर्श संभालती है। एक दिन में इसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल छह लाख परामर्श से ऊपर गया है।
मंत्रालय ने कहा कि इस प्लेटफ़ॉर्म ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को अस्पतालों और क्लीनिकों की भौतिक सीमाओं से आगे पहुंचाया है, और परामर्श को लोगों के रहने वाले समुदायों के क़रीब ला दिया है।
मंत्रालय के मुताबिक़, कुल इस्तेमाल में महिलाओं का हिस्सा 57 फ़ीसदी से ज़्यादा है। चालीस फ़ीसदी परामर्श 46 साल और उससे ज़्यादा उम्र के लोग लेते हैं, जिनमें 60 साल और उससे ज़्यादा उम्र के वरिष्ठ नागरिकों का हिस्सा 16.25 फ़ीसदी है।
प्लेटफ़ॉर्म में अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर आधारित क्लिनिकल डिसीज़न सपोर्ट सिस्टम, एआई-सीडीएसएस, जुड़ा है, जो परामर्श के दौरान डॉक्टरों की मदद करता है और जिसका मक़सद क्लिनिकल फ़ैसलों की गुणवत्ता, एकरूपता और दक्षता बढ़ाना है। इस प्रणाली को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार 2026 में स्वर्ण पुरस्कार मिला।
ई-संजीवनी को आपात प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली, 112, से भी जोड़ा गया है, जिससे आपात सेवाएं दूर बैठे चिकित्सा विशेषज्ञों से जुड़ती हैं।
यह सेवा अब प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थानों के ज़रिए विशेषज्ञ ओपीडी परामर्श तक फैल रही है। एम्स जोधपुर, एम्स जम्मू और एम्स पटना में चुनिंदा विशेषज्ञताओं के लिए मरीज़-से-डॉक्टर टेली-परामर्श शुरू हो गए हैं।
ई-संजीवनी को सेंटर फ़ॉर डेवलपमेंट ऑफ़ एडवांस्ड कंप्यूटिंग, सी-डैक, ने विकसित किया है, और सी-डैक मोहाली शुरू से तकनीकी विकास और इंजीनियरिंग सहायता दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक़, स्वास्थ्य प्रणाली की ज़रूरतें बदलने के साथ स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्लेटफ़ॉर्म के विकास को दिशा दी है।
मौजूदा 2.5 लाख से 3 लाख परामर्श प्रति दिन की रफ़्तार से प्लेटफ़ॉर्म साल में करीब 9 करोड़ से 11 करोड़ परामर्श संभालता है। मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि 50 करोड़ में से कितने परामर्श सीधे मरीज़ और डॉक्टर के बीच हुए, और कितने स्थानीय केंद्र के स्वास्थ्य कर्मी के ज़रिए, या आगे की देखभाल पर कैसे नज़र रखी जाती है।
मंत्रालय ने कहा कि यह प्लेटफ़ॉर्म देश के डिजिटल स्वास्थ्य तंत्र का एक अहम हिस्सा बन गया है।










