नई दिल्ली: प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव-2 और भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास ने 4 अक्टूबर को कहा कि भारत के बैंकों और कर्ज़दाताओं की सेहत सुधारना हाल के वर्षों में अर्थव्यवस्था की मज़बूती की सबसे बड़ी पहचान रहा है।
ऑल इंडिया रेडियो के मुताबिक़, नई दिल्ली में कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन में दास ने कहा, "वित्तीय क्षेत्र की सेहत की बहाली हाल के वर्षों में भारत की मज़बूती की निर्णायक विशेषता रही है।" उन्होंने कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, बैंकों में नई पूंजी डालने और रचनात्मक नियामकीय निगरानी जैसे सुधारों की मदद से वित्तीय क्षेत्र विकास का मज़बूत स्तंभ बनकर उभरा है।
दास ने कहा कि सकल ग़ैर-निष्पादित परिसंपत्तियां, यानी बैंक कर्ज़ का वह हिस्सा जिसे लौटाना कर्ज़दारों ने बंद कर दिया है, इस साल जून में तेज़ी से घटकर 1.68 फ़ीसदी रह गईं, और बैंकों का मुनाफ़ा काफ़ी सुधरा है।
उन्होंने बाहरी खातों का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि बाहरी क्षेत्र के सूझबूझ भरे प्रबंधन ने व्यापक आर्थिक स्थिरता में मदद की है, और निर्यात के लगातार विविधीकरण, मुक्त व्यापार समझौतों और सेवा व्यापार में लगातार अधिशेष की वजह से भारत के बाहरी संकेतक कुल मिलाकर मज़बूत बने रहे। उन्होंने कहा कि 2025-26 का चालू खाता घाटा जीडीपी के 0.6 फ़ीसदी पर, संभालने लायक़ स्तर के भीतर रहा।
दास ने "कौटिल्य एंड ए रिसर्जेंट इंडिया: लेसन्स फ़ॉर इमर्जिंग मार्केट्स" नाम के सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में बात की। डीडी इंडिया के मुताबिक़, वित्त मंत्रालय के साथ मिलकर आर्थिक विकास संस्थान के आयोजित इस सम्मेलन का पांचवां संस्करण 3 से 5 अक्टूबर तक "रेज़िलिएंस इन एन एज ऑफ़ फ़्लक्स" यानी उथल-पुथल के दौर में मज़बूती, विषय पर हुआ, जिसमें 180 से ज़्यादा प्रतिभागी थे, जिनमें 80 से ज़्यादा करीब 30 देशों से आए थे। कार्यक्रम के मुताबिक़, रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा को "सेंट्रल बैंकिंग इन एन एज ऑफ़ फ़्लक्स" सत्र में विशेष संबोधन देना था, जिसकी अध्यक्षता यूरोपीय केंद्रीय बैंक के पूर्व अध्यक्ष ज़्यां-क्लोद त्रिशे को करनी थी।
सम्मेलन के पिछले संस्करण 2022 में "रीडिफ़ाइनिंग द फ़्यूचर", 2023 में "नेविगेटिंग ए वर्ल्ड ऑन फ़ायर", 2024 में "द इंडियन एरा" और 2025 में "सीकिंग प्रॉस्पेरिटी इन टर्बुलेंट टाइम्स" विषयों पर हुए थे।
सम्मेलन के इतर, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग ने कहा कि 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 फ़ीसदी की वृद्धि के बाद अर्थव्यवस्था ने अपनी रफ़्तार बनाए रखी है। उन्होंने कहा कि कंपनियों का मज़बूत प्रदर्शन और लगातार पूंजी निवेश, जिसमें निजी क्षेत्र का निवेश भी शामिल है, अहम संकेतकों में से हैं, और यह रफ़्तार एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स और फ़िच रेटिंग्स समेत एजेंसियों के भारत के विकास अनुमान हाल में बढ़ाने में भी दिखती है।
पश्चिम एशिया के तनाव और तेल की क़ीमतों के झटके के बारे में पूछे जाने पर गर्ग ने कहा कि सरकार के दख़ल, और परिवारों व निजी क्षेत्र के उठाए क़दमों ने अर्थव्यवस्था पर बाहरी झटकों का असर सीमित रखने में मदद की है।
छोटे चालू खाता घाटे के बावजूद बाहरी क्षेत्र इस वक़्त दबाव में है। ऑल इंडिया रेडियो की रिपोर्ट किए आंकड़ों के मुताबिक़, 25 सितंबर तक के दो हफ़्तों में रुपये को स्थिर रखने के लिए रिज़र्व बैंक के डॉलर बेचने से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 33.2 अरब डॉलर घटकर 747.5 अरब डॉलर रह गया, और विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों ने सितंबर में भारतीय शेयरों से शुद्ध रूप से 35,861 करोड़ रुपये निकाले। दोनों के पीछे कच्चे तेल की ऊंची क़ीमतें और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड थीं।
दास का तर्क यह था कि दिवाला क़ानून और बैंकों में पूंजी डालने जैसे सुधारों ने, बाहरी खातों के सावधानी भरे प्रबंधन के साथ मिलकर, अर्थव्यवस्था को ऐसे दबाव झेलने के लिए बेहतर स्थिति में ला दिया है।










