नई दिल्ली: ऑल इंडिया रेडियो की 6 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक़, रक्षा मंत्रालय ने ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड के साथ भारतीय नौसेना के जहाज़ों के लिए ब्रह्मोस फ़ायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर का 660 करोड़ रुपये से ज़्यादा का अनुबंध किया है।
अनुबंध पर नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की मौजूदगी में हस्ताक्षर हुए।
यह ख़रीद बाय (इंडियन-इंडिजिनसली डिज़ाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफ़ैक्चर्ड) श्रेणी में आती है, जो भारत में डिज़ाइन, विकसित और निर्मित उपकरणों के लिए है। मंत्रालय के मुताबिक़, इन प्रणालियों में कम से कम 68 फ़ीसदी स्वदेशी सामग्री होगी, और इस परियोजना में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों समेत कई भारतीय उद्योगों के हिस्सा लेने की उम्मीद है।
मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि फ़ायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर कितने जहाज़ों के लिए हैं, या किन जहाज़ों के लिए।
मंत्रालय ने कहा कि कई अग्रिम पंक्ति के युद्धपोतों पर लगी ब्रह्मोस प्रणाली समुद्री हमलों के लिए नौसेना की मुख्य सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल है, और नया अनुबंध भारत की समुद्री सुरक्षा और रक्षा क्षमताओं को मज़बूत करेगा।
ब्रह्मोस रैमजेट से चलने वाली एक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल है, जो करीब मैक 3, यानी लगभग 3,700 किलोमीटर प्रति घंटा, की रफ़्तार से उड़ती है। इसे ब्रह्मोस एयरोस्पेस बनाती है, जो भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन और रूस की एनपीओ माशिनोस्त्रोयेनिया का 5 दिसंबर 1995 को बना संयुक्त उद्यम है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी 50.5 फ़ीसदी और रूस की 49.5 फ़ीसदी है। इसका नाम दो नदियों, भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा, को जोड़कर बना है।
यह मिसाइल जहाज़ों, पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों और ज़मीन पर रखे लॉन्चरों से दाग़ी जा सकती है। अलग-अलग संस्करणों की रेंज अलग है: निर्यात संस्करण की करीब 290 किलोमीटर, हवा से दाग़े जाने वाले संस्करण की 450 से 500 किलोमीटर, और जहाज़ व ज़मीन से दाग़े जाने वाले संस्करणों की 800 से 900 किलोमीटर, और ज़्यादा रेंज वाले संस्करण विकास में हैं। इससे लैस नौसेना के जहाज़ों में आईएनएस कोलकाता, आईएनएस कोच्चि, आईएनएस चेन्नई, आईएनएस विशाखापत्तनम, आईएनएस मोरमुगाओ, आईएनएस इम्फ़ाल, आईएनएस तेग़, आईएनएस तरकश और आईएनएस त्रिकंद शामिल हैं।
इस मिसाइल का पहला परीक्षण 12 जून 2001 को चांदीपुर की इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से हुआ था। इसका पहला नौसैनिक प्रक्षेपण 12 फ़रवरी 2003 को विध्वंसक आईएनएस राजपूत से हुआ, जिसके बाद जहाज़ से दाग़ा जाने वाला जहाज़-रोधी संस्करण चालू हो गया। सेना ने अपनी पहली ब्रह्मोस रेजिमेंट, 861 मिसाइल रेजिमेंट, 21 जून 2007 को बनाई, और 22 नवंबर 2017 को बंगाल की खाड़ी में समुद्री लक्ष्य पर सुखोई-30एमकेआई लड़ाकू विमान से पहली बार यह मिसाइल दाग़ी गई। वायुसेना को हवा से दाग़े जाने वाले संस्करण से लैस सु-30एमकेआई विमानों का पहला स्क्वाड्रन 20 जनवरी 2020 को मिला।
ब्रह्मोस अब निर्यात भी होती है। फ़िलीपींस को तीन बैटरियों के करीब 37.5 करोड़ डॉलर के अनुबंध के तहत पहली खेप अप्रैल 2024 में मिली। वियतनाम के साथ करीब 70 करोड़ डॉलर के एक सौदे की ख़बर दिसंबर 2024 में आई, और इंडोनेशिया के साथ करीब 45 करोड़ डॉलर के सौदे पर बातचीत की ख़बरें हैं। कार्यक्रम के रिकॉर्ड के मुताबिक़, एक हल्का संस्करण, ब्रह्मोस-एनजी, विकास में है, और हाइपरसोनिक ब्रह्मोस-II को विकसित होने में सात से आठ साल लग सकते हैं।
यह अनुबंध उसी दिन हुआ जिस दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विशाखापत्तनम के हिंदुस्तान शिपयार्ड में नौसेना के पहले स्वदेशी फ़्लीट सपोर्ट शिप, सूर्य, को लॉन्च किया। सिंह ने वहां कहा कि पिछले एक दशक में भारत का रक्षा विनिर्माण आयातित प्लेटफ़ॉर्म पर निर्भरता से आगे बढ़कर देश में ही उन्नत प्रणालियां डिज़ाइन करने और बनाने की ओर गया है, और समय पर डिलीवरी, स्वदेशी डिज़ाइन और मज़बूत आपूर्ति श्रृंखला पर ध्यान देने को कहा।
मंत्रालय ने ब्रह्मोस फ़ायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर की डिलीवरी का कार्यक्रम नहीं बताया।





